घने और निर्जन काम्यक वन की खामोशी में केवल सूखे पत्तों की सरसराहट और पक्षियों की दूर से आती आवाज़ें ही गूंज रही थीं। हस्तिनापुर के राजमहलों का सुख भोगने वाले पांडव अब वनवास का कठिन और संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे थे। धर्मराज युधिष्ठिर के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं, लेकिन यह चिंता उनके अपने शारीरिक कष्टों या छीने गए राज्य के लिए नहीं थी। वनवास के इस विकट समय में भी हज़ारों ऋषि-मुनि, ब्राह्मण और अनुयायी उनके साथ चल रहे थे। युधिष्ठिर की असली पीड़ा यह थी कि वे एक राजा होते हुए भी अपने आश्रितों और अतिथियों को भोजन कराने में असमर्थ सिद्ध हो रहे थे। उनका विशाल हृदय इस विचार से ही छलनी हो रहा था कि उनके द्वार से कोई भूखा कैसे लौट सकता है।
अपनी इस गहरी व्यथा का समाधान पाने के लिए युधिष्ठिर ने महर्षि धौम्य की सलाह ली और सूर्य देव की कठोर आराधना आरंभ की। उनकी सच्ची और निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य साक्षात प्रकट हुए। सूर्य देव की सुनहरी आभा से पूरा काम्यक वन जगमगा उठा। उन्होंने युधिष्ठिर को एक दिव्य तांबे का बर्तन सौंपते हुए कहा कि यह चमत्कारी ‘अक्षय पात्र’ है। उन्होंने वरदान दिया कि जब तक तुम्हारी पत्नी द्रौपदी प्रतिदिन अपना भोजन समाप्त नहीं कर लेती, तब तक यह पात्र तुम्हारे सभी अतिथियों और अनुयायियों को मनचाहा और स्वादिष्ट भोजन अनवरत प्रदान करता रहेगा। युधिष्ठिर की आँखों में कृतज्ञता के आंसू छलक आए और उस दिन के बाद से वन में भी पांडवों का शिविर एक शाही रसोई की तरह चलने लगा, जहाँ कोई भी कभी भूखा नहीं सोता था।
जब यह सुखद समाचार हस्तिनापुर में दुर्योधन के कानों तक पहुँचा, तो ईर्ष्या और क्रोध की आग ने उसे भीतर तक जला दिया। वह किसी भी कीमत पर पांडवों को कष्ट में तड़पते हुए देखना चाहता था। अवसर की तलाश में बैठे दुर्योधन ने एक अत्यंत कुटिल योजना बनाई। एक दिन, अपने अत्यंत क्रोधी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासा अपने दस हज़ार शिष्यों की विशाल मंडली के साथ हस्तिनापुर पधारे। दुर्योधन ने उनका शानदार आतिथ्य सत्कार किया और जब महर्षि प्रसन्न हुए, तो उसने वरदान स्वरूप एक ऐसा वर मांग लिया जिसने पांडवों के जीवन में तूफान ला दिया। उसने महर्षि से विनम्रता का नाटक करते हुए कहा कि आप कृपा करके मेरे भाइयों, पांडवों के शिविर में भी अपना आतिथ्य स्वीकार करें, लेकिन कृपया वहां तब जाएँ जब द्रौपदी अपना भोजन कर चुकी हों। महर्षि दुर्वासा ने बिना किसी संदेह के उसकी यह बात मान ली।
तय योजना के अनुसार, महर्षि दुर्वासा अपने दस हज़ार भूखे शिष्यों के साथ पांडवों के आश्रम में ठीक उसी समय पहुँचे, जब द्रौपदी अक्षय पात्र से अपना भोजन समाप्त करके उसे साफ़ कर चुकी थीं। युधिष्ठिर ने महर्षि का सत्कार किया, लेकिन भीतर ही भीतर उनके प्राण सूख रहे थे। महर्षि ने आदेश दिया कि हम सब नदी में स्नान करके आते हैं, तब तक हमारे लिए भोजन का प्रबंध करो। यह कहकर वे नदी की ओर चल दिए। इधर आश्रम में हाहाकार मच गया क्योंकि अक्षय पात्र उस दिन के लिए अपनी चमत्कारिक शक्ति खो चुका था। यदि महर्षि दुर्वासा स्नान करके लौटे और उन्हें भोजन नहीं मिला, तो उनका भीषण श्राप पांडवों को पल भर में भस्म कर देगा।
भय और गहरी निराशा से घिरी द्रौपदी अपनी कुटिया के भीतर गई, जहाँ उसके पास अब कोई मानवीय विकल्प नहीं बचा था। उसने आँखें बंद कीं और अपने सबसे बड़े सखा, रक्षक और मार्गदर्शक भगवान श्रीकृष्ण को पूरे हृदय से पुकारा। उसने करुण स्वर में कहा कि हे गोविंद, हे द्वारकाधीश, आज आपकी सखी घोर संकट में है, जिस तरह आपने भरी सभा में मेरी लाज रखी थी, आज उसी तरह इस संकट से मेरे परिवार की रक्षा कीजिए। उसकी पुकार में इतनी करुणा और अटूट विश्वास था कि द्वारका में बैठे सुदर्शन चक्रधारी स्वयं को रोक नहीं पाए।
अगले ही पल, कुटिया के द्वार पर श्रीकृष्ण अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ खड़े थे। द्रौपदी दौड़कर उनके पास गई और रोते हुए अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई। श्रीकृष्ण ने शांत स्वर में कहा कि सखी, वह सब तो ठीक है, लेकिन मुझे बहुत ज़ोर की भूख लगी है, इसलिए पहले मुझे कुछ खाने को दो। द्रौपदी को लगा कि शायद उसके सखा इस भीषण संकट के समय भी उसके साथ परिहास कर रहे हैं। उसने रोते हुए कहा कि अक्षय पात्र तो धुल चुका है, उसमें अन्न का एक दाना भी शेष नहीं है। श्रीकृष्ण ने हठ करते हुए कहा कि ज़रा वह पात्र मुझे दिखाओ तो सही। द्रौपदी ने झिझकते हुए वह साफ़ किया हुआ बर्तन उनके सामने रख दिया। श्रीकृष्ण ने ध्यान से देखा और पात्र के एक किनारे पर चिपका हुआ अन्न का एक इकलौता दाना और साग का एक छोटा सा तिनका निकाल लिया।
श्रीकृष्ण ने उस एक दाने को अपने मुँह में रखा और आँखें बंद करके गहरी संतुष्टि के साथ बोले कि इस भोजन से संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी की क्षुधा शांत हो जाए। जैसे ही श्रीकृष्ण ने उस दाने को निगला, नदी पर स्नान कर रहे महर्षि दुर्वासा और उनके दस हज़ार शिष्यों के पेट अचानक इस तरह तन गए जैसे उन्होंने छप्पन भोग खा लिए हों। उन्हें ज़ोर-ज़ोर से डकारें आने लगीं और उनके भीतर अन्न का एक निवाला भी ग्रहण करने की जगह नहीं बची। महर्षि दुर्वासा चकित रह गए और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि हमारा पेट तो गले तक भर गया है, अब यदि हम जाकर पांडवों का भोजन नहीं खाएंगे, तो यह उनका भारी अपमान होगा। श्राप देने वाले क्रोधी महर्षि दुर्वासा अब स्वयं शर्मिंदगी और अचरज से भर गए और अपने शिष्यों के साथ बिना पांडवों को बताए ही वहाँ से चुपचाप चले गए।
जब भीम महर्षि को बुलाने नदी तट पर गए, तो वहाँ कोई नहीं था। तब पांडवों और द्रौपदी को समझ में आया कि यह सब उनके सखा कृष्ण की ही अद्भुत लीला थी। अक्षय पात्र केवल तांबे का एक चमत्कारिक बर्तन नहीं था, बल्कि यह इस शाश्वत सत्य का प्रमाण था कि जब हृदय में सच्ची भक्ति और पूर्ण समर्पण हो, तो ईश्वर स्वयं हर संकट में ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। एक छोटे से अन्न के दाने में भी पूरे ब्रह्मांड को तृप्त करने की असीम शक्ति आ जाती है, बशर्ते वह दाना सच्चे प्रेम, करुणा और अटूट विश्वास के भाव से परोसा गया हो।



