श्लोक १:
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥
अर्थ:
श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला (अथवा अत्यंत विस्तृत) है। उसका एक-एक अक्षर मनुष्यों के बड़े-बड़े पापों को नष्ट करने वाला है।
श्लोक २:
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥
अर्थ:
नीले कमल के समान श्याम वर्ण वाले, कमल के समान नेत्रों वाले, माता जानकी और लक्ष्मण जी के साथ विराजमान और जटाओं के मुकुट से सुशोभित भगवान श्रीराम का ध्यान करके;
श्लोक ३:
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥
अर्थ:
जिनके हाथों में खड्ग, तरकश, धनुष और बाण हैं, जो राक्षसों का अंत करने वाले हैं, और जो अपनी लीला से जगत की रक्षा करने के लिए अवतरित हुए हैं, उन अजन्मा और सर्वव्यापक भगवान श्रीराम का ध्यान करके;
श्लोक ४:
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥
अर्थ:
बुद्धिमान मनुष्य को पापों का नाश करने वाले और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले इस रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। मेरे सिर की रक्षा राघव करें और मेरे मस्तक की रक्षा दशरथ-पुत्र करें।
श्लोक ५:
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥
अर्थ:
कौशल्या नंदन मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करें, विश्वामित्र के प्रिय मेरे दोनों कानों की रक्षा करें, यज्ञों के रक्षक मेरी नासिका की रक्षा करें और सुमित्रा के पुत्र (लक्ष्मण) से प्रेम करने वाले श्रीराम मेरे मुख की रक्षा करें।
श्लोक ६:
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥
अर्थ:
विद्याओं के भंडार मेरी जिह्वा (जीभ) की रक्षा करें, भरत द्वारा वंदित मेरे कंठ की रक्षा करें, दिव्य आयुध धारण करने वाले मेरे दोनों कंधों की रक्षा करें और शिवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान मेरी दोनों भुजाओं की रक्षा करें।
श्लोक ७:
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥
अर्थ:
सीतापति मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें, परशुराम जी को जीतने वाले मेरे हृदय की रक्षा करें, खर नामक राक्षस का वध करने वाले मेरे मध्य भाग की रक्षा करें और जाम्बवान को आश्रय देने वाले मेरी नाभि की रक्षा करें।
श्लोक ८:
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥
अर्थ:
सुग्रीव के स्वामी मेरी कमर की रक्षा करें, हनुमान जी के प्रभु मेरी दोनों पेडू (कमर के नीचे का भाग) की रक्षा करें और राक्षसों के कुल का नाश करने वाले रघुकुल श्रेष्ठ मेरी दोनों जांघों की रक्षा करें।
श्लोक ९:
जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥
अर्थ:
समुद्र पर पुल बांधने वाले मेरे दोनों घुटनों की रक्षा करें, रावण का वध करने वाले मेरी दोनों पिंडलियों की रक्षा करें, विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले मेरे दोनों चरणों की रक्षा करें और भगवान श्रीराम मेरे संपूर्ण शरीर की रक्षा करें।
श्लोक १०:
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥
अर्थ:
जो भी पुण्यवान मनुष्य राम के बल से युक्त इस रक्षा स्तोत्र का पाठ करता है, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनम्र हो जाता है।
श्लोक ११:
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥
अर्थ:
पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरने वाले या वेश बदलकर घूमने वाले प्राणी (राक्षस आदि) राम नाम से सुरक्षित व्यक्ति को देख भी नहीं सकते।
श्लोक १२:
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥
अर्थ:
जो मनुष्य राम, रामभद्र या रामचन्द्र—इन नामों का स्मरण करता है, वह पापों से लिप्त नहीं होता और संसार के भोग तथा मोक्ष दोनों को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक १३:
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥
अर्थ:
संसार को जीतने वाले एकमात्र मंत्र ‘राम’ नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को जो व्यक्ति कंठ में धारण करता है (याद करता है), सभी सिद्धियाँ उसके वश में हो जाती हैं।
श्लोक १४:
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥
अर्थ:
जो मनुष्य ‘वज्रपंजर’ नामक इस राम कवच का स्मरण करता है, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता और वह सर्वत्र विजय और मंगल प्राप्त करता है।
श्लोक १५:
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥
अर्थ:
भगवान शिव ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का जिस प्रकार आदेश दिया था, उसी प्रकार प्रातःकाल जागने पर ऋषि बुधकौशिक ने इसे लिख दिया।
श्लोक १६:
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥
अर्थ:
जो कल्पवृक्षों के बगीचे के समान हैं, जो सभी विपत्तियों का अंत करने वाले हैं, और जो तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं, वे श्रीमान राम ही हमारे प्रभु हैं।
श्लोक १७:
तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥
अर्थ:
जो युवा, रूपवान, सुकुमार, अत्यंत बलवान, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले और वल्कल (पेड़ों की छाल) तथा मृगचर्म धारण करने वाले हैं;
श्लोक १८:
फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥
अर्थ:
जो कंद-मूल और फल खाने वाले, अपनी इंद्रियों को वश में रखने वाले, तपस्वी और ब्रह्मचारी हैं, वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई;
श्लोक १९:
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥
अर्थ:
जो सभी जीवों को शरण देने वाले हैं, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ हैं और राक्षसों के कुल का नाश करने वाले हैं, वे रघुकुल श्रेष्ठ (राम और लक्ष्मण) हमारी रक्षा करें।
श्लोक २०:
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥
अर्थ:
जिन्होंने अपने धनुष पर बाण चढ़ा रखे हैं और जिनके पास कभी समाप्त न होने वाले बाणों से युक्त तरकश हैं, वे राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा के लिए मार्ग में सदैव मेरे आगे चलें।
श्लोक २१:
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥
अर्थ:
कवच और तलवार धारण किए हुए, हाथ में धनुष-बाण लिए हुए युवा राम, लक्ष्मण के साथ चलते हुए हमारे सभी मनोरथों की रक्षा करें (उन्हें पूर्ण करें)।
श्लोक २२:
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥
अर्थ:
दशरथ पुत्र, शूरवीर, लक्ष्मण जी जिनके अनुचर हैं, अत्यंत बलवान, काकुत्स्थ वंशज, पूर्ण पुरुष, कौशल्या नंदन और रघुकुल में श्रेष्ठ;
श्लोक २३:
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥
अर्थ:
जो वेदांत के द्वारा जानने योग्य हैं, यज्ञों के स्वामी हैं, पुराणों में वर्णित पुरुषोत्तम हैं, माता जानकी के प्रिय हैं, और जिनके पराक्रम की कोई सीमा नहीं है;
श्लोक २४:
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥
अर्थ:
भगवान शिव कहते हैं – जो मेरा भक्त श्रद्धापूर्वक नित्य इन नामों का जप करता है, वह अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक २५:
रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥
अर्थ:
दूर्वा (दूब) के समान श्याम वर्ण वाले, कमल के समान नेत्रों वाले और पीताम्बर धारण करने वाले भगवान राम की जो मनुष्य इन दिव्य नामों से स्तुति करते हैं, वे जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ते।
श्लोक २६:
रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ॥
अर्थ:
लक्ष्मण के बड़े भाई, रघुकुल में श्रेष्ठ, सीता जी के स्वामी, अत्यंत सुंदर, काकुत्स्थ वंश के भूषण, करुणा के सागर, गुणों के भंडार, ब्राह्मणों के प्रिय और परम धार्मिक;
श्लोक २७:
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥
अर्थ:
राजाओं के राजा, सत्य प्रतिज्ञा वाले, दशरथ के पुत्र, श्याम वर्ण वाले, शांत मूर्ति, संपूर्ण लोकों में सुंदर, रघुकुल के तिलक, राघव और रावण के शत्रु भगवान राम की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक २८:
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥
अर्थ:
राम, रामभद्र, रामचन्द्र, विधाता स्वरूप, रघुनाथ, सम्पूर्ण जगत के स्वामी और माता सीता के पति भगवान श्रीराम को मेरा नमस्कार है।
श्लोक २९:
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ॥
अर्थ:
हे श्रीराम! हे रघुनन्दन राम! हे श्रीराम! हे भरत के बड़े भाई राम!
श्लोक ३०:
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥
अर्थ:
हे श्रीराम! हे युद्ध में अत्यंत पराक्रमी राम! हे श्रीराम! हे राम! आप मेरे आश्रय (शरण) बनें।
श्लोक ३१:
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ॥
अर्थ:
मैं भगवान श्रीरामचन्द्र के चरणों का मन से स्मरण करता हूँ। मैं भगवान श्रीरामचन्द्र के चरणों का वचनों से गुणगान करता हूँ।
श्लोक ३२:
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥
अर्थ:
मैं भगवान श्रीरामचन्द्र के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मैं भगवान श्रीरामचन्द्र के चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ।
श्लोक ३३:
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ॥
अर्थ:
श्रीराम मेरी माता हैं, श्रीरामचन्द्र ही मेरे पिता हैं। श्रीराम मेरे स्वामी हैं और श्रीरामचन्द्र ही मेरे सखा (मित्र) हैं।
श्लोक ३४:
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुः ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥
अर्थ:
दयालु श्रीरामचन्द्र ही मेरा सर्वस्व हैं। उनके अतिरिक्त मैं किसी और को नहीं जानता, बिल्कुल नहीं जानता।
श्लोक ३५:
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥
अर्थ:
जिनके दाईं ओर लक्ष्मण जी, बाईं ओर जनक पुत्री माता सीता और सामने हनुमान जी विराजमान हैं, उन रघुनन्दन भगवान राम की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक ३६:
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥
अर्थ:
जो सम्पूर्ण लोकों में सबसे सुंदर हैं, युद्ध भूमि में धैर्यवान हैं, कमल के समान नेत्रों वाले हैं, रघुवंश के स्वामी हैं, जो करुणा की मूर्ति हैं और करुणा करने वाले हैं, उन श्रीरामचन्द्र की मैं शरण में जाता हूँ।
श्लोक ३७:
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥
अर्थ:
मन के समान गति वाले, वायु के समान वेग वाले, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, वायु के पुत्र और वानरों की सेना के मुख्य नायक, श्रीराम के दूत (हनुमान जी) की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक ३८:
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥
अर्थ:
कविता रूपी शाखा पर बैठकर ‘राम-राम’ इन मधुर अक्षरों का मधुर स्वर में गान करने वाले महर्षि वाल्मीकि रूपी कोयल की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक ३९:
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥
अर्थ:
सभी विपत्तियों को दूर करने वाले, सभी प्रकार की संपत्तियों को प्रदान करने वाले और संपूर्ण लोकों में सुंदर भगवान श्रीराम को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।
श्लोक ४०:
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥
अर्थ:
‘राम-राम’ इस नाम की गर्जना (जप) जन्म-मृत्यु के बीजों को भून डालने वाली (नष्ट करने वाली), सुख और संपत्ति प्रदान करने वाली और यमदूतों को भयभीत करने वाली है।
श्लोक ४१:
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ॥
अर्थ:
राजाओं में श्रेष्ठ मणि के समान भगवान राम की सदा विजय होती है। मैं रमापति राम का भजन करता हूँ। जिन राम ने राक्षसों की सेना का नाश कर दिया, उन राम को मेरा नमस्कार है।
श्लोक ४२:
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥
अर्थ:
राम से बड़ा कोई आश्रय नहीं है, मैं राम का ही दास हूँ। मेरा चित्त सदा राम में ही लीन रहे। हे राम! आप मेरा उद्धार करें।
श्लोक ४३:
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥
अर्थ:
(भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं) हे सुमुखी! मैं ‘राम राम राम’ इस प्रकार मनोरम राम नाम में ही रमण करता हूँ। राम का नाम विष्णु सहस्त्रनाम के समान है।
