महाराष्ट्र की भक्ति-परंपरा में संत नरहरी सोनार का स्मरण एक ऐसे संत के रूप में किया जाता है जिन्होंने जीवन के साधारण काम को भी साधना बना दिया। ‘सोनार’ कोई उपाधि नहीं, बल्कि स्वर्णकार (Goldsmith) समुदाय से जुड़ा उपनाम/सर्नेम है—और यही पहचान उनके जीवन में एक आध्यात्मिक प्रतीक बन गई। जिस तरह स्वर्णकार आग, हथौड़े और धैर्य से धातु को शुद्ध और सुंदर बनाता है, उसी तरह भक्ति, अनुशासन और समर्पण से मन की मलिनता दूर होकर अंतर्मन शुद्ध होता है—यही संदेश नरहरी सोनार की जीवनकथा से उभरता है।
जो लोग संत नरहरी सोनार के बारे में नहीं जानते, उनके लिए यह जीवनी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भक्ति को केवल दर्शन या विचार के रूप में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में घटित होने वाले परिवर्तन के रूप में दिखाया गया है—दुकान, औज़ार, ग्राहकी, जिम्मेदारियाँ, और उसी बीच ईश्वर का अनुभव। साथ ही, उनकी कथा एक लंबे समय से चले आ रहे मतभेद—हरि (विष्णु) और हर (शिव) के कथित विरोध—पर भी एक गहरा प्रकाश डालती है। संत नरहरी सोनार की स्मृति इसी कारण “भेद मिटाकर एकता दिखाने वाले संत” के रूप में होती है।
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संत नरहरी सोनार कौन थे?
संत नरहरी सोनार महाराष्ट्र के वारकरी भक्ति आंदोलन से जुड़े माने जाते हैं, जिसका प्रमुख केंद्र पंढरपुर है। परंपरागत संत-साहित्य और लोक-स्मृति में उनका समय सामान्यतः 13वीं–14वीं शताब्दी के आसपास बताया जाता है। मध्यकालीन संतों के मामले में कठोर ऐतिहासिक दस्तावेज़ सीमित होने के कारण उनके जीवन-विवरण मुख्यतः चरित्रग्रंथों (हागियोग्राफी), लोककथाओं, अभंग-परंपरा और कीर्तन-समाज के माध्यम से सुरक्षित रहे।
फिर भी एक बात लगभग हर परंपरा में स्थिर है—नरहरी सोनार की कहानी किसी बाहरी उपलब्धि की नहीं, बल्कि अंदर के रूपांतरण की कहानी है। वे एक ऐसे भक्त माने जाते हैं जिनकी प्रारंभिक श्रद्धा एक विशेष परंपरा में अत्यंत प्रबल थी, पर अंततः उन्होंने यह अनुभव किया कि ईश्वर को किसी एक नाम, रूप या पहचान की दीवारों में बाँधा नहीं जा सकता।
“सोनार” क्यों कहा जाता है?
“सोनार” शब्द का अर्थ है स्वर्णकार। महाराष्ट्र और आसपास के क्षेत्रों में यह समुदाय/पेशा दर्शाने वाला उपनाम भी है। संत नरहरी सोनार के जीवन में यह पहचान केवल परिचय नहीं है, बल्कि उनकी साधना का केंद्रीय बिंदु है।
भक्ति-परंपरा में कई संत अपने जीवन और पेशे की भाषा में ही आध्यात्मिक सत्य बोलते हैं। किसान बीज-भूमि की भाषा में, दर्जी कपड़े-सिलाई की भाषा में, कुम्हार मिट्टी-चाक की भाषा में—और नरहरी सोनार सोने की शुद्धता, अग्नि, तौल, और नाप की भाषा में ईश्वर का रहस्य समझाते हैं।
उनकी जीवनकथा का संदेश यही है कि आध्यात्मिकता जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन को ही साधना बनाना है। कार्य ईमानदार हो, मन में नाम-स्मरण हो, और भीतर विनम्रता हो—तो कार्यस्थल भी मंदिर बन सकता है।
संत नरहरी सोनार कब और कहाँ रहे?
परंपरागत जानकारी के अनुसार संत नरहरी सोनार का जीवन मध्यकालीन महाराष्ट्र में रहा और उनका घनिष्ठ संबंध पंढरपुर से माना जाता है। कुछ परंपराएँ उनके जीवन के आरंभिक चरण को यादवकालीन क्षेत्र देवगिरि (दौलताबाद) से भी जोड़ती हैं, पर उनकी सबसे प्रसिद्ध पहचान पंढरपुर की भक्ति-संस्कृति के साथ ही बनी।
क्योंकि संत-जीवनियाँ प्रायः मौखिक परंपरा से लिखित रूप तक पहुँचीं, इसलिए उनके सटीक जन्म-वर्ष या मृत्यु-वर्ष पर अलग-अलग मान्यताएँ मिल सकती हैं। पर उनका सांस्कृतिक संदर्भ स्पष्ट है—महाराष्ट्र में भक्ति की लहर तेज़ हो रही थी, वारकरी परंपरा लोक-जीवन को जोड़ रही थी, और अनेक जाति-समुदायों व पेशों से जुड़े संत भक्ति को जन-आंदोलन बना रहे थे।
विठोबा की नगरी में शिव-भक्ति की कठोरता
नरहरी सोनार की जीवनी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह माना जाता है कि प्रारंभ में वे शैव-भक्त थे और उनकी श्रद्धा भगवान शिव में अत्यंत गहरी थी। यह तथ्य इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि पंढरपुर मुख्यतः विठोबा (विठ्ठल/पांडुरंग) का तीर्थ है, जिसे वारकरी परंपरा में विष्णु-रूप माना जाता है।
कथाओं में नरहरी की शिव-भक्ति को “असत्य” नहीं कहा गया, बल्कि उसे “सीमित” बताया गया है—यानी भक्ति तो सच्ची थी, पर उसमें एक प्रकार की हठ थी: वे विठोबा के मंदिर की ओर देखना तक नहीं चाहते थे। यह मनोवृत्ति मानव-स्वभाव की एक सामान्य कमजोरी भी दिखाती है—कई बार हम अपनी परंपरा को इतना “एकमात्र सत्य” मान लेते हैं कि दूसरे रूप/नाम को स्वीकार करना अहंकार का मुद्दा बन जाता है।
विठोबा के कमरबंद की कथा
संत नरहरी सोनार की जीवनी का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग विठोबा के कमरबंद (कमरपट्टा/कमरबंध) से जुड़ा है। व्यापक रूप से प्रचलित कथा के अनुसार किसी भक्त या धनी दाता ने मन्नत पूरी होने पर विठोबा को सोने का सुंदर कमरबंद चढ़ाने का संकल्प लिया।
दाता पंढरपुर के श्रेष्ठ स्वर्णकार नरहरी सोनार के पास आता है और कमरबंद बनवाने का आग्रह करता है। नरहरी कार्य स्वीकार करते हैं, पर शर्त रखते हैं कि वे विठोबा के मंदिर में नहीं जाएंगे; माप किसी और तरीके से लाया जाए। दाता माप-जानकारी लेकर आता है और नरहरी कमरबंद तैयार कर देते हैं।
जब कमरबंद मंदिर में विठोबा की मूर्ति पर चढ़ाने का प्रयास होता है तो वह ठीक नहीं बैठता—कभी छोटा पड़ता है, कभी बड़ा। दाता फिर नरहरी के पास लौटता है। नरहरी दोबारा सुधार करते हैं, पर समस्या बनी रहती है। आखिरकार दाता आग्रह करता है कि अब तो नरहरी को स्वयं आकर नाप लेना पड़ेगा—वरना यह भेंट पूर्ण नहीं होगी।
कथाओं में नरहरी का अंततः मंदिर जाना एक गहरे संकेत के साथ बताया जाता है—कई वर्णनों में वे आँखों पर पट्टी बाँधकर जाते हैं, ताकि “विठोबा को देखने” का प्रश्न ही न रहे। वे मूर्ति के पास जाकर हाथ से नाप लेते हैं।
यहीं कथा का चमत्कारिक/आध्यात्मिक मोड़ आता है। नरहरी को स्पर्श में कुछ ऐसा अनुभव होता है जो उन्हें शिव-लक्षण जैसा प्रतीत होता है—जैसे कमर के पास साँप-सी आकृति, या वेशभूषा का संकेत, या एक ऐसा आध्यात्मिक अनुभव कि सामने खड़ा देव ‘पराया’ नहीं है।
कथा का संदेश यह है कि नरहरी के भीतर की दीवार टूट जाती है। इसे कोई भक्त चमत्कार माने, कोई प्रतीक माने, और कोई मिस्टिकल अनुभूति—पर सार एक ही है: नरहरी समझते हैं कि ईश्वर को “हरि बनाम हर” के विवाद में बाँधना अहंकार है। जिनके लिए वे शिव हैं, वही विठोबा में भी हैं—और भक्त के भीतर यदि सच्ची अनुभूति हो जाए तो विभाजन टिक नहीं पाता।
संत नरहरी सोनार ने क्या सिखाया?
संत नरहरी सोनार की जीवनकथा का मूल संदेश है कि भक्ति का उद्देश्य अहंकार बढ़ाना नहीं, अहंकार गलाना है। यदि हमारी पूजा हमें अधिक कठोर, अधिक द्वेषपूर्ण, और अधिक “मैं सही हूँ” बनाने लगे, तो वह पूजा आत्मा को नहीं, अहंकार को पोषण देती है।
नरहरी का रूपांतरण यही सिखाता है कि भक्ति का सर्वोच्च फल बाहरी पहचान नहीं, बल्कि अंतर का विस्तार है—विनम्रता, करुणा, और ईश्वर को हर रूप में देखने की क्षमता। वारकरी परंपरा की दृष्टि से यह शिक्षा ‘नाम-स्मरण’ और ‘समदृष्टि’ के साथ पूरी तरह मेल खाती है।
संत नरहरी सोनार के अभंग और उनकी भाषा
संत नरहरी सोनार को अभंग-परंपरा से जोड़ा जाता है। अभंग मराठी भक्ति-काव्य का वह स्वर है जिसने वारकरी परंपरा को सदियों तक जीवित रखा। उनके अभंगों में स्वर्णकार-जीवन की भाषा विशेष रूप से दिखाई देती है—अग्नि, शुद्धता, तौल, कसौटी, कारीगरी, और अलंकार।
उनकी कविता यह बताती है कि “सच्चा आभूषण” शरीर का नहीं, मन का होता है। जिस तरह सोना शुद्ध होने पर चमकता है, उसी तरह मन नाम-स्मरण और भक्ति से शुद्ध होकर प्रकाशमान होता है।
उनकी जीवनी को अन्य संतों से अलग क्या बनाता है?
कई संत-जीवनियाँ वैराग्य और संसार-त्याग के भाव पर केंद्रित होती हैं—घर छोड़ना, धन त्यागना, सामाजिक भूमिका से दूर जाना। नरहरी सोनार की जीवनी इस दृष्टि से अलग है। उनकी पवित्रता का आधार यह बताया जाता है कि वे जीवन के भीतर रहते हुए भी एक उच्च अनुभव तक पहुँचे।
वे स्वर्णकार थे—उनका कार्य, उनकी कारीगरी, और उनकी ईमानदारी ही उनकी साधना का माध्यम बने। इसीलिए उनकी कथा आधुनिक मनुष्य को बहुत सहज लगती है: हर कोई संन्यासी नहीं बन सकता, पर हर कोई अपने काम को ईश्वर-समर्पण बना सकता है।
वारकरी परंपरा में संत नरहरी सोनार का स्थान
महाराष्ट्र के संत-परंपरा में वारकरी आंदोलन का एक बड़ा योगदान यह रहा कि इसने भक्ति को केवल विद्वानों या उच्च वर्गों तक सीमित नहीं रहने दिया। किसान, कुम्हार, दर्जी, समाज के अनेक वर्गों के लोग—सब इस धारा में जुड़े।
नरहरी सोनार का स्थान इसी व्यापकता का प्रतीक है। वे दिखाते हैं कि संत बनने के लिए केवल पांडित्य नहीं, बल्कि सत्य-जीवन और अंतर-परिवर्तन चाहिए। एक स्वर्णकार भी आध्यात्मिक गुरु बन सकता है; एक कार्यशाला भी मंदिर बन सकती है; और एक उपनाम भी भक्ति का प्रतीक बन सकता है।
आज संत नरहरी सोनार को कहाँ याद किया जाता है?
संत नरहरी सोनार का नाम पंढरपुर और महाराष्ट्र के वारकरी-समाज में आदर के साथ लिया जाता है। विशेष रूप से स्वर्णकार/सोनार समुदाय उनकी स्मृति को अपने आध्यात्मिक आदर्श के रूप में देखता है।
उनकी पुण्यतिथि परंपरा में प्रायः माघ मास से जोड़कर याद की जाती है। कई स्थानों पर इस दिन भजन, अभंग-गायन, और कीर्तन के माध्यम से उनके जीवन-संदेश को स्मरण किया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में पंचांग-आधारित विवरणों में भिन्नता मिल सकती है, पर भक्त-समाज में उनका स्मरण निरंतर बना रहता है।
नरहरी सोनार के संदेश में ‘हरि-हर’ की एकता का अर्थ क्या है?
उनकी जीवनकथा को अक्सर हरि–हर विवाद के समाधान की तरह देखा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी परंपराएँ एक जैसी हो जाती हैं, बल्कि यह कि परम सत्य को विभाजन में बाँधना अहंकार है। रूप और परंपरा भिन्न हो सकते हैं, पर भीतर की दिव्यता एक है—यह भाव उनकी कथा का आत्मा-तत्व है।
आधुनिक पाठक संत नरहरी सोनार से क्या सीखें?
आज के समय में जब पहचान के आधार पर मतभेद और कठोरता बढ़ती दिखती है, संत नरहरी सोनार की कथा एक शांत संदेश देती है: आध्यात्मिकता का लक्ष्य किसी बहस को जीतना नहीं, बल्कि अपने भीतर की कठोरता को जीतना है।
वे यह भी सिखाते हैं कि ईमानदार काम और भक्ति के बीच कोई दीवार नहीं। यदि कर्म शुद्ध है, मन में नाम है, और अहंकार घट रहा है—तो साधना शुरू हो चुकी है। यही कारण है कि ‘सोनार’—एक उपनाम—उनके जीवन में केवल पहचान नहीं, प्रतीक बन जाता है।
अंततः संत नरहरी सोनार को केवल इस लिए नहीं याद किया जाता कि उन्होंने सोने के आभूषण बनाए, बल्कि इस लिए भी कि ईश्वर ने उनके भीतर का ‘अहं’ गलाकर उन्हें एक ऐसा भक्त बनाया जिसने विभाजन के स्थान पर एकता, और कठोरता के स्थान पर विनम्रता का मार्ग दिखाया।
Sant Narhari Sonar Biography: The Goldsmith-Saint of Pandharpur



