Ambubachi Mela: सदियों पुराना वो भारतीय उत्सव, जो माहवारी के रूढ़िवादी सामाजिक टैबू को तोड़ता है

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आधुनिक समाज में आज भी ‘माहवारी’ या ‘पीरिएड्स’ (Menstruation) एक ऐसा शब्द है, जिस पर लोग खुलकर बात करने से कतराते हैं। आज भी कई घरों में माहवारी के दौरान महिलाओं को रसोई से दूर रखा जाता है और उनका मंदिरों में प्रवेश वर्जित होता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा सदियों पुराना उत्सव मनाया जाता है, जहां एक देवी के रजस्वला (Menstruating) होने का न सिर्फ जश्न मनाया जाता है, बल्कि इस दौरान बहने वाले जल को परम पवित्र मानकर पूजा जाता है?

असम के गुवाहाटी स्थित नीलाचल पर्वत पर विराजमान मां कामाख्या का ‘अम्बुबाची मेला’ (Ambubachi Mela) सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है; यह नारीत्व, प्रकृति के चक्र और प्रजनन क्षमता (Fertility) का एक विशाल उत्सव है, जो माहवारी से जुड़े हर रूढ़िवादी टैबू को सीधे तौर पर चुनौती देता है।

जब तीन दिनों के लिए विश्राम करती हैं देवी

हर साल जून के महीने (असमिया पंचांग के आषाढ़ महीने) में अम्बुबाची मेले का आयोजन होता है। पौराणिक और तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, यह वह समय होता है जब धरती माता या देवी कामाख्या अपने वार्षिक मासिक धर्म (Menstruation cycle) से गुजरती हैं।

इन तीन दिनों तक मंदिर के कपाट पूरी तरह से बंद कर दिए जाते हैं। इस अवधि को ‘प्रवृत्ति’ कहा जाता है। इन तीन दिनों में न तो मंदिर में कोई घंटी बजती है, न ही कोई पूजा-पाठ होता है। मान्यता है कि जिस तरह एक स्त्री को इस दौरान विश्राम की आवश्यकता होती है, उसी तरह देवी भी इन तीन दिनों तक विश्राम करती हैं।

सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि इस दौरान स्थानीय किसान भी ज़मीन की खुदाई, बुवाई या हल जोतने का काम बंद कर देते हैं। यह प्रकृति के प्रति सम्मान का एक अद्वितीय उदाहरण है, जो सिखाता है कि धरती ही हमारी वास्तविक माता है।

बिना मूर्ति वाला 51 शक्तिपीठों में से एक

कामाख्या मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके गर्भगृह में देवी की कोई मूर्ति नहीं है। यहां चट्टान के बीच बनी एक योनि (Yoni) के आकार की दरार की पूजा होती है, जिसमें से लगातार प्राकृतिक जल बहता रहता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। मान्यता है कि सती का ‘योनि’ भाग नीलाचल पर्वत पर गिरा था, जिसके बाद यह स्थान 51 शक्तिपीठों में सबसे प्रमुख और शक्तिशाली पीठ बन गया।

‘रक्त वस्त्र’: वह प्रसाद जिसके लिए तरसते हैं लाखों भक्त

तीन दिनों के विश्राम के बाद, चौथे दिन जब मंदिर के कपाट खुलते हैं (जिसे निवृत्ति कहा जाता है), तो लाखों की संख्या में अघोरी, तांत्रिक, साधु और आम श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं।

इस दौरान गर्भगृह में एक सफेद कपड़ा रखा जाता है। जब कपाट खुलते हैं, तो वह कपड़ा लाल रंग का हो चुका होता है। इसे ‘रक्त वस्त्र’ (Rakta Bastra) कहा जाता है। यह माहवारी का प्रतीक माना जाने वाला कपड़ा अशुद्ध नहीं, बल्कि सबसे पवित्र प्रसाद माना जाता है। भक्त इस कपड़े के एक छोटे से टुकड़े को पाने के लिए कई दिनों तक कतारों में खड़े रहते हैं। इसे समृद्धि, उर्वरता और सौभाग्य का सबसे बड़ा आशीर्वाद माना जाता है।

जो समाज माहवारी को अशुद्ध मानता है, उसके लिए एक सबक

अम्बुबाची मेला भारतीय समाज के उस विरोधाभास (Paradox) को उजागर करता है, जहां एक तरफ स्त्री के मासिक धर्म को ‘अशुद्ध’ बताकर उसे कई अधिकारों से वंचित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ लाखों पुरुष और महिलाएं एक रजस्वला देवी के सामने नतमस्तक होते हैं।

यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्त्री के शरीर और उसके प्राकृतिक जैविक बदलावों को कभी भी शर्मिंदगी या अशुद्धता की नज़रों से नहीं देखा गया। माहवारी जीवन की उत्पत्ति का आधार है। यदि यह चक्र न हो, तो संसार में मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कामाख्या का अम्बुबाची मेला आधुनिक भारत से एक ही सवाल पूछता है: “जिस प्राकृतिक चक्र के बिना सृष्टि का निर्माण संभव नहीं, और जिस चक्र के लिए हम देवी की आराधना करते हैं, वह एक आम स्त्री के लिए अछूत और शर्मिंदगी का विषय कैसे हो सकता है?”

यह सिर्फ पूरब का महाकुंभ नहीं है; यह नारीत्व की उस शक्ति का उत्सव है, जिसे हर समाज को बिना किसी संकोच के स्वीकार करना चाहिए।