श्री रामदास नवमी (दास नवमी) 2026

श्री रामदास नवमी—जिसे महाराष्ट्र में प्रेम से “दास नवमी” भी कहा जाता है—रामभक्ति परंपरा का एक अत्यंत श्रद्धापूर्ण पर्व/दिवस है। यह दिन समर्थ रामदास स्वामी (17वीं शताब्दी के महान संत, कवि और मार्गदर्शक) की महासमाधि (समाधि-दिवस/देहत्याग स्मृति) के रूप में मनाया जाता है। समर्थ रामदास स्वामी ने श्रीराम और श्रीहनुमान की भक्ति को जीवन-शुद्धि, अनुशासन, साहस और धर्मपालन से जोड़कर समाज को एक नया आध्यात्मिक दृष्टिकोण दिया।

“नवमी” शब्द होने के कारण बहुत से लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि यह श्रीराम नवमी (भगवान राम का जन्मोत्सव) ही है। लेकिन श्री रामदास नवमी और श्रीराम नवमी अलग-अलग हैं। श्रीराम नवमी चैत्र शुक्ल नवमी को आती है, जबकि श्री रामदास नवमी (दास नवमी) माघ कृष्ण पक्ष की नवमी को मानी जाती है।

यदि आपने “जय जय रघुवीर समर्थ!” का जयघोष सुना हो, सज्जनगड़ जाने की चर्चा सुनी हो, या दासबोध और मनाचे श्लोक का नाम सुना हो—तो समझिए यह दिन उसी जीवंत परंपरा से जुड़ा है।

श्री रामदास नवमी 2026 की तिथि

वर्ष 2026 में श्री रामदास नवमी का प्रमुख पर्व/पालन बुधवार, 11 फ़रवरी 2026 को माना जा रहा है। कई पंचांगों में नवमी तिथि का फैलाव 10–11 फ़रवरी के बीच हो सकता है, इसलिए कुछ स्थानों पर स्थानीय सूर्योदय के आधार पर तिथि में हल्का अंतर दिखाई दे सकता है। अपने शहर/क्षेत्र के लिए बिल्कुल सटीकता चाहिए, तो स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।

श्री रामदास नवमी क्या है?

श्री रामदास नवमी वह दिन है जब भक्त समर्थ रामदास स्वामी की महासमाधि का स्मरण करते हैं। भारतीय संत-परंपरा में संतों की समाधि-तिथि को केवल “मृत्यु” नहीं माना जाता, बल्कि इसे एक पवित्र अवसर माना जाता है—

  • संत की शिक्षाओं को दोबारा समझने का,
  • भक्ति और चरित्र को मजबूत करने का,
  • संयम, सेवा और धर्म के संकल्प को ताज़ा करने का,
  • और कीर्तन, प्रवचन व सेवा के माध्यम से समाज के साथ जुड़ने का।

इस दिन कई लोग रामनाम जप, मनाचे श्लोक पाठ, दासबोध का वाचन/श्रवण, और राम-हनुमान मंदिरों में विशेष प्रार्थना करते हैं।

समर्थ रामदास स्वामी कौन थे?

समर्थ रामदास स्वामी महाराष्ट्र के सबसे प्रभावशाली संतों में गिने जाते हैं। वे संत, दार्शनिक, कवि और आध्यात्मिक गुरु थे। कई परंपरागत विवरणों में उनका जन्म-नाम नारायण (कुछ जगह “नारायण थोसार” भी) बताया जाता है और कहा जाता है कि उनका जन्म महाराष्ट्र के जांब नामक गांव में हुआ था।

वे “रामदास” कहलाए—अर्थात “श्रीराम के दास”। उनके जीवन का संदेश केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था। उन्होंने बताया कि सच्ची भक्ति वह है जो:

  • मन को नियंत्रित करे,
  • चरित्र को उज्ज्वल बनाए,
  • जीवन में अनुशासन लाए,
  • और व्यक्ति को भयमुक्त, साहसी तथा जिम्मेदार बनाए।

इसी कारण उनकी परंपरा को अक्सर “भक्ति + शक्ति” का सुंदर संतुलन कहा जाता है—जहाँ भक्ति नरमी नहीं, बल्कि भीतर से मजबूत बनाती है।

इसे “दास नवमी” क्यों कहते हैं?

बहुत सामान्य प्रश्न है—रामदास नवमी को लोग “दास नवमी” क्यों कहते हैं?

“दास” का अर्थ है सेवक। “रामदास” का अर्थ है श्रीराम का सेवक। चूँकि यह दिन समर्थ रामदास स्वामी से जुड़ा है, इसलिए इस दिन को आदर और अपनापन से “दास नवमी” कहा जाता है। इस अवसर पर कई जगहों पर ये जयघोष सुनाई देते हैं:

  • “जय जय रघुवीर समर्थ!”
  • “श्रीराम जय राम जय जय राम”

श्री रामदास नवमी जन्मोत्सव है या पुण्यतिथि?

यह सबसे बड़ा भ्रम है। साफ़ समझिए:

  • समर्थ रामदास स्वामी का जन्म परंपरा के अनुसार श्रीराम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी) से जुड़ा माना जाता है।
  • जबकि श्री रामदास नवमी (दास नवमी) उनका महासमाधि-दिवस/पुण्यतिथि है, जो माघ कृष्ण नवमी को मनाई जाती है।

यानी फ़रवरी में आने वाली यह नवमी मुख्य रूप से समाधि-स्मरण का दिन है।

श्री रामदास नवमी का महत्व क्यों है?

आज के समय में भी यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मनुष्य को मन, अनुशासन और जिम्मेदारी की ओर लौटाता है।

1) मन को “रीसेट” करने का दिन

समर्थ रामदास स्वामी की शिक्षाएँ मन पर केंद्रित हैं—मन कैसे भटकाता है, कैसे भ्रम पैदा करता है, और कैसे उसे प्रशिक्षण देकर जीवन का सबसे बड़ा सहायक बनाया जा सकता है। तनाव और विचलन से भरे आधुनिक जीवन में यह संदेश बहुत उपयोगी है।

2) आध्यात्मिकता के साथ भीतर की शक्ति

उनकी परंपरा बताती है कि धर्म और भक्ति का मार्ग व्यक्ति को कमज़ोर नहीं, बल्कि निडर और स्थिर बनाता है।

3) सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभाव

महाराष्ट्र की आध्यात्मिक संस्कृति पर समर्थ रामदास स्वामी का गहरा प्रभाव रहा है। उनकी वाणी ने समाज में चरित्र, साहस और आत्म-उन्नति का संदेश फैलाया।

(नोट: कुछ परंपराएँ उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज के मार्गदर्शक रूप में भी स्मरण करती हैं, जबकि इतिहास-लेखन में इस संबंध के स्वरूप पर अलग-अलग मत मिलते हैं। फिर भी उनकी आध्यात्मिक-सामाजिक भूमिका व्यापक रूप से मानी जाती है।)

समर्थ रामदास स्वामी की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?

उनकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनका साहित्य है—जो केवल भक्ति नहीं, बल्कि जीवन-व्यवहार का व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देता है।

1) दासबोध

दासबोध उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक मानी जाती है। इसमें जीवन जीने की कला, विवेक, आत्म-नियंत्रण, धर्म और गृहस्थ जीवन में संतुलन जैसे विषयों पर सरल और प्रभावशाली मार्गदर्शन मिलता है।

2) मनाचे श्लोक

मनाचे श्लोक मन को संबोधित श्लोकों का संग्रह है। इसमें मन को संयमित करने, सत्य बोलने, अच्छे संस्कार, भक्ति और शुद्ध जीवन-शैली की प्रेरणा मिलती है। महाराष्ट्र में कई घरों में इसका नियमित पाठ होता है।

3) हनुमान-भक्ति और “मारुति” परंपरा

समर्थ रामदास स्वामी का विशेष संबंध हनुमान उपासना से माना जाता है। परंपरा में उनसे जुड़े 11 मारुति मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जिसे कई लोग “भक्ति के साथ शारीरिक-मानसिक शक्ति” की परंपरा मानते हैं।

श्री रामदास नवमी कहाँ प्रमुख रूप से मनाई जाती है?

यह दिन जहाँ भी रामदासी/रामभक्त परंपरा के लोग हैं वहाँ मनाया जाता है, लेकिन कुछ स्थान विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

1) सज्जनगड़ (सातारा के पास)

सज्जनगड़ समर्थ रामदास स्वामी से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध स्थान है। दास नवमी पर यहाँ बड़ी संख्या में भक्त दर्शन, भजन, प्रवचन और सेवा के लिए आते हैं।

2) चाफळ (सातारा के पास)

चाफळ भी समर्थ परंपरा से जुड़ा प्रमुख तीर्थ है, जहाँ श्रीराम और मारुति मंदिरों की परंपरा प्रसिद्ध है।

3) जांब (जन्मस्थान परंपरा)

परंपरा के अनुसार जांब को उनका जन्मस्थान माना जाता है और वहाँ भी श्रद्धालु विशेष रूप से जाते हैं।

श्री रामदास नवमी कैसे मनाई जाती है?

हर क्षेत्र/परिवार की परंपरा थोड़ी अलग हो सकती है, लेकिन सामान्यतः यह दिन भक्ति (भजन-जप), विचार (सत्संग/प्रवचन) और सेवा (दान/अन्नदान) के रूप में मनाया जाता है।

सामान्य पूजा-पाठ और परंपराएँ

  1. स्नान और संकल्प
    दिन की शुरुआत शुद्धता से होती है। लोग संकल्प लेते हैं कि आज वे रामनाम और संत-स्मरण करेंगे और अच्छे आचरण का पालन करेंगे।
  2. दीपक जलाना और नैवेद्य
    श्रीराम/हनुमान/समर्थ रामदास स्वामी के समक्ष दीपक, अगरबत्ती और सरल नैवेद्य (फल/मिष्ठान्न) अर्पित किया जाता है।
  3. रामनाम जप, मनाचे श्लोक, स्तोत्र-पाठ
    कई घरों में:
  • रामनाम जप
  • मनाचे श्लोक
  • हनुमान स्तोत्र (परिवार परंपरा अनुसार)
  1. कीर्तन/प्रवचन/सत्संग
    मंदिरों और सत्संग मंडलों में दासबोध, चरित्र-निर्माण और भक्ति-मार्ग पर प्रवचन होते हैं।
  2. सेवा और अन्नदान
    भक्तों को भोजन कराना, जरूरतमंदों की मदद, मंदिर-सेवा—इन सबको इस दिन बहुत शुभ माना जाता है।
  3. मंदिर/तीर्थ-दर्शन
    समय और सुविधा हो तो सज्जनगड़ या स्थानीय राम/हनुमान मंदिर में दर्शन किए जाते हैं।

घर पर सरल श्री रामदास नवमी पूजा-विधि

यदि आप पहली बार कर रहे हैं और सरल तरीका चाहते हैं, तो यह विधि अपनाएँ:

  1. पूजा-स्थान साफ करें और श्रीराम/हनुमान/समर्थ रामदास स्वामी का चित्र/मूर्ति रखें।
  2. जल अर्पण करें, फिर दीया और धूप जलाएँ।
  3. फूल चढ़ाएँ और फल/मिष्ठान्न का नैवेद्य रखें।
  4. 5–11 मिनट रामनाम जप करें।
  5. दासबोध का छोटा अंश पढ़ें/सुनें या कुछ मनाचे श्लोक बोलें।
  6. 2 मिनट ध्यान करके एक छोटा संकल्प लें:
    • आज क्रोध नहीं करेंगे,
    • सत्य बोलेंगे,
    • किसी एक गलत आदत पर नियंत्रण रखेंगे,
    • या किसी जरूरतमंद की मदद करेंगे।
  7. प्रसाद बाँटें और संभव हो तो छोटा दान/सेवा करें।

यही दास नवमी का सार है—भक्ति के साथ आत्म-सुधार।

समर्थ रामदास स्वामी की शिक्षाओं से हमें क्या सीख मिलती है?

बहुत से लोग पूछते हैं—“मुख्य संदेश क्या है?”

उनकी शिक्षाओं से ये बातें आज भी जीवन बदल सकती हैं:

  • मन को प्रशिक्षित करें: भावनाएँ और आलस निर्णय न चलाएँ।
  • अनुशासन अपनाएँ: छोटी-छोटी दिनचर्याएँ बड़े परिणाम देती हैं।
  • रामभक्ति बनाए रखें: मन को ईश्वर-स्मरण से जोड़ें।
  • समाज-सेवा करें: सेवा के बिना साधना अधूरी है।
  • साहस रखें: धर्म के लिए स्थिर और निडर मन आवश्यक है।

यदि आप इनमें से एक भी बात ईमानदारी से अपनाएँ, तो यह दिन केवल रस्म नहीं, जीवन-परिवर्तन का अवसर बन जाता है।

Leave a Reply

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *