श्रावण मास और खान पान

श्रावण मास हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्षा ऋतु में आने वाला एक अत्यंत पावन, पुण्यदायक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व वाला महीना है। यह मास विशेष रूप से भगवान शिव की उपासना, उपवास, संयम और सात्त्विक जीवनशैली को समर्पित होता है। इस दौरान श्रद्धालु भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप, और रात्रि जागरण जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। यह मास केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि और नियंत्रण का अवसर भी प्रदान करता है।

आयुर्वेद के अनुसार भी यह मास विशेष महत्त्व रखता है। वर्षा ऋतु में वात दोष का प्रकोप बढ़ जाता है, पाचन अग्नि मंद पड़ जाती है और रोगों की संभावना बढ़ जाती है। इस कारण इस महीने में खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि हम अपने आहार और दिनचर्या को आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार ढालें, तो इस समय को एक स्वास्थ्यवर्धक और आध्यात्मिक उन्नति के अवसर में परिवर्तित कर सकते हैं। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि श्रावण मास में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, वह भी प्राचीन आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से श्रावण मास

Ayurvedick drishtikon se shravan maas : आयुर्वेद एक ऐसा जीवन शास्त्र है जो शरीर, मन और आत्मा की समग्र शुद्धि और संतुलन की बात करता है। ऋतु के अनुसार आहार-विहार और दिनचर्या का निर्धारण करना आयुर्वेद की विशेषता है, जिसे ‘ऋतुचर्या’ कहा जाता है। वर्षा ऋतु में वात दोष प्रमुखता से बढ़ता है, साथ ही पित्त का संचय भी होता है और कफ दोष भी नमी और ठंड के कारण प्रभावित होता है। इस कारण यह ऋतु विशेष रूप से संवेदनशील होती है और विशेष देखभाल की मांग करती है।

इस ऋतु में जलवायु में नमी के कारण पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार जब ‘जठराग्नि’ मंद हो जाती है तो भोजन पचता नहीं है और आम (toxins) शरीर में उत्पन्न होने लगते हैं। यह आम ही बाद में अनेक रोगों का कारण बनता है। इसी कारण से इस मास में व्रत और उपवास की परंपरा भी जुड़ी हुई है, ताकि शरीर को विश्राम मिले और पाचन शक्ति सुधरे।

श्रावण मास संयम और साधना का समय है। इस समय में व्यक्ति यदि संयमित दिनचर्या, सात्विक और सुपाच्य आहार, और शुद्ध विचारों को अपनाए, तो उसका शरीर, मन और आत्मा तीनों शुद्ध होते हैं और वह भगवान शिव की कृपा का पात्र बनता है।

श्रावण मास में क्या खाना चाहिए?

Shravan maas me kya khana chahiye : श्रावण मास दौरान व्यक्ति को अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आयुर्वेद और धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस माह में सात्त्विक, हल्का तथा पचने में आसान भोजन ग्रहण करना उत्तम माना गया है। नीचे श्रावण मास के दौरान क्या खाना उचित होता है, इसकी विस्तृत जानकारी दी गई है।

1. सात्विक और सुपाच्य आहार लें

  • मूंग दाल और चावल की खिचड़ी: यह सुपाच्य होती है, वात और पित्त दोनों दोषों को संतुलित करती है।
  • दलिया, रवा उपमा, सादी रोटियाँ: कम मसाले वाला हल्का भोजन पाचन के लिए उत्तम है।
  • उबली सब्जियाँ: लौकी, तुरई, परवल, गाजर, पालक, चुकंदर, शलगम, सहजन, टिंडा आदि सब्जियाँ हल्के नमक और घी के साथ।
  • घी: देसी गाय का घी अग्निदीपक होता है और आयुर्वेद में ओज को बढ़ाने वाला माना गया है।
  • गाय का दूध: गर्म कर के पिएं। इसमें हल्दी या इलायची मिलाकर सेवन करना और भी लाभकारी होता है।
  • कच्चा नारियल, नींबू, धनिया, और ताजा अदरक का सेवन भी पाचन शक्ति को बढ़ाता है।

2. फल और सूखे मेवे

  • मौसमी फल: अनार, सेब, अमरूद, केला, पपीता, खजूर, नाशपाती, तरबूज, चीकू
  • सूखे मेवे: रातभर भिगोए हुए बादाम, अखरोट, मुनक्का, अंजीर
  • फल फाइबर और पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और ऊर्जा देने का प्राकृतिक स्रोत होते हैं। व्रत में यह विशेष लाभकारी माने गए हैं।

3. गर्म, ताजा और सात्विक भोजन करें

  • आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से ताजा बना हुआ गर्म भोजन ही सर्वोत्तम होता है।
  • बासी, फ्रिज में रखा, या ठंडा खाना शरीर में विष और वात दोष को बढ़ाता है।
  • हर भोजन में कच्ची हरी धनिया या पुदीना अवश्य मिलाएं। यह वात-पित्त-कफ को संतुलित करता है।

4. औषधीय जड़ी-बूटियाँ और मसाले

  • तुलसी, अदरक, काली मिर्च, हल्दी, दालचीनी, तेजपत्ता, अजवाइन, हिंग, सौंठ
  • त्रिफला, त्रिकटु, पंचकोल जैसे चूर्ण विशेष रूप से उपयोगी होते हैं
  • इनका सेवन चाय, काढ़ा, या भोजन में मसाले के रूप में किया जा सकता है।

5. उपवास के समय ये आहार लें

  • साबूदाना खिचड़ी, समक के चावल, कुट्टू और सिंघाड़े के आटे से बने पराठे, पूड़ी
  • मखाना, शकरकंद, अरबी, उबले हुए केले से बनी टिक्की
  • दही, दूध, छाछ, नारियल पानी
  • ड्राई फ्रूट्स और मौसमी फल
  • नींबू, शहद और गर्म जल का सेवन दिनभर शरीर को ऊर्जा देता है।

6. हर्बल पेय और आयुर्वेदिक काढ़ा

  • तुलसी-अदरक का काढ़ा
  • दालचीनी और इलायची से बना दूध
  • सौंफ, जीरा और अजवाइन का पानी – पाचन में सहायक
  • नींबू-शहद जल – शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करता है

श्रावण मास में क्या नहीं खाना चाहिए?

Shravan maas me kya nahi khana chahiye : श्रावण मास, जो भगवान शिव की आराधना और आत्मशुद्धि का विशेष समय होता है, इसमें न केवल पूजा-पाठ बल्कि आहार संबंधी नियमों का भी विशेष महत्व होता है। इस माह में ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं जिन्हें स्वास्थ्य और धार्मिक दृष्टिकोण से त्याग देना श्रेयस्कर माना गया है। नीचे विस्तार से बताया गया है कि श्रावण मास में किन चीज़ों के सेवन से बचना चाहिए और क्यों।

1. मांसाहारी भोजन और तामसिक आहार का त्याग करें

  • मांस, मछली, अंडा, शराब, सिगरेट, गुटखा आदि तामसिक पदार्थ इस मास में वर्जित हैं।
  • यह न केवल पाचन को बिगाड़ते हैं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को भी प्रभावित करते हैं।

2. तला-भुना और मसालेदार खाना न खाएं

  • अत्यधिक तैलीय, नमकीन और तीखा खाना वात, पित्त और कफ को असंतुलित करता है।
  • समोसा, पकोड़े, बर्फी, मिठाई, नमकीन आदि से दूर रहें।

3. ठंडा और बासी भोजन वर्जित है

  • फ्रिज में रखा भोजन, आइसक्रीम, ठंडा दूध या दही, कोल्ड ड्रिंक आदि का सेवन नहीं करें।
  • यह पाचन अग्नि को मंद कर देते हैं और सर्दी-जुकाम को बढ़ाते हैं।

4. विरुद्ध आहार संयोजन से बचें

  • दूध के साथ नमक, दही के साथ फल, शहद के साथ गर्म चीजें – यह सभी आयुर्वेद में ‘विरुद्ध आहार’ कहे गए हैं जो शरीर में विकार उत्पन्न करते हैं।

5. उपवास में भारी अनाज न लें

  • गेहूं, चावल, मक्की जैसे अनाज व्रत में त्याज्य माने गए हैं।
  • इनके स्थान पर उपवास अनाज जैसे राजगिरा, समक, सिंघाड़ा अधिक लाभकारी हैं।

धार्मिक दृष्टिकोण से खानपान

श्रावण मास शिवभक्ति का महीना है। इस महीने में संयम, नियम, ब्रह्मचर्य और सात्विक जीवन अपनाने की प्रेरणा दी जाती है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस मास में भगवान शिव अत्यंत कृपालु होते हैं और जो व्यक्ति इस मास में नियमपूर्वक व्रत, ध्यान, जाप और संयम करता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

भोजन को ‘नैवेद्य’ मानकर खाने की परंपरा इस मास में विशेष रूप से महत्व रखती है। इसका अर्थ है – जो भी खा रहे हैं, उसे भगवान को अर्पण करके प्रसाद रूप में ग्रहण करें। इससे न केवल भोजन पवित्र होता है, बल्कि व्यक्ति में कृतज्ञता, संतोष और आत्मिक संतुलन भी आता है।

उपयोगी सुझाव

  • दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले करें – यह शरीर को प्रबल बनाता है।
  • गुनगुना पानी पीना दिनभर की ऊर्जा को संतुलित करता है।
  • त्रिफला चूर्ण रात को सोते समय लेने से शरीर शुद्ध होता है।
  • दिन में दो बार हर्बल काढ़ा लें।
  • भोजन करते समय ध्यान रखें – चुपचाप, शांत मन से खाएं, टीवी या मोबाइल न देखें।
  • दिन में दो बार शिव मंत्रों का जाप करें – ‘ॐ नमः शिवाय’।
  • ध्यान, प्राणायाम और योगासन को दिनचर्या में शामिल करें।

निष्कर्ष

श्रावण मास केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि आत्मिक, मानसिक और शारीरिक शुद्धि का संगम है। यह वह समय है जब व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण पाता है, अपने आहार, विचार और व्यवहार को सात्विक बनाता है और स्वयं को प्रकृति और परमात्मा के और निकट लाता है। आयुर्वेद के अनुसार यदि इस समय में उचित आहार-विहार, संयम, व्रत और ध्यान किया जाए, तो यह मास जीवन में अद्भुत परिवर्तन ला सकता है।

इस मास में किया गया सात्विक आहार न केवल पाचन को बेहतर बनाता है बल्कि मानसिक स्थिरता और आत्मिक बल भी देता है। भगवान शिव के कृपा प्राप्त करने का यह मास एक सुनहरा अवसर है, जहाँ संयमित आचरण और शुद्ध आहार ही सच्चा तप है।

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