कौन होते हैं शंकराचार्य ? भूमिका, अर्थ, पात्रता और भारत में कितने शंकराचार्य होते हैं? आइए जानते हैं

अगर आपने टीवी डिबेट्स में, बड़े धार्मिक आयोजनों में, या फिर किसी मंदिर/धर्म-चर्चा के संदर्भ में “शंकराचार्य जी” शब्द सुना है और मन में सवाल आया हो—“शंकराचार्य आखिर होते कौन हैं?”—तो यह बिल्कुल सामान्य है। बहुत से लोगों को यह शब्द किसी “पद” या “ओहदे” जैसा लगता है, लेकिन वास्तविक अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। शंकराचार्य कोई सरकारी पद नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक उपाधि (spiritual title) है, जो आदि शंकराचार्य की परंपरा में अद्वैत वेदांत के शिक्षण और संन्यासी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।

इस लेख का उद्देश्य बिल्कुल सरल भाषा में, एक आम पाठक के लिए पूरी जानकारी देना है—शंकराचार्य क्या होते हैं, कितने शंकराचार्य माने जाते हैं, “पीठ” और “मठ” क्या होते हैं, यह पद कौन धारण कर सकता है, चयन कैसे होता है, वे क्या कार्य करते हैं, और वे कौन से सवाल हैं जो अक्सर लोगों के मन में आते हैं लेकिन स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते।

Table of Contents

कौन होते हैं शंकराचार्य?

शंकराचार्य शब्द का सीधा अर्थ है—“शंकर (आदि शंकर) की परंपरा में आचार्य/गुरु”। व्यवहार में, शंकराचार्य वह संन्यासी-आचार्य होते हैं जो अद्वैत वेदांत की परंपरा से जुड़े किसी प्रमुख मठ/पीठ के पीठाधीश्वर (मुख्य) या जगद्गुरु के रूप में नेतृत्व करते हैं।

इसे आसान तरीके से समझिए:

  • आदि शंकराचार्य = अद्वैत वेदांत के महान आचार्य/संन्यासी, जिनके नाम से एक बड़ी शिक्षण-परंपरा जुड़ी है।
  • शंकराचार्य = उसी परंपरा का आज का प्रमुख संन्यासी गुरु, जो किसी स्थापित पीठ/मठ का नेतृत्व करके शिक्षाओं को आगे बढ़ाता है।

इसलिए जब लोग “शंकराचार्य” कहते हैं, तो अक्सर उनका संकेत किसी सम्मानित संन्यासी आचार्य की ओर होता है—जो धर्म, वेदांत, शास्त्र, और परंपरा का मार्गदर्शन करते हैं।

आदि शंकराचार्य कौन थे, और इस परंपरा में उनका नाम इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

आदि शंकराचार्य को सामान्यतः एक ऐसे महान संन्यासी-विद्वान के रूप में देखा जाता है जिन्होंने अद्वैत वेदांत की शिक्षाओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया और भारतीय दर्शन में एक प्रभावशाली स्थान बनाया। परंपरागत कथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के बीच कई जगह मतभेद/विवाद भी मिलते हैं—यानी, जीवन-वृत्त और कुछ संस्थागत दावों की कहानी हमेशा एक जैसी नहीं मिलती।

फिर भी, एक आम पाठक के लिए मुख्य बात यह है:

  • उनके नाम से वेदांत की एक मजबूत शिक्षण परंपरा जुड़ी।
  • समय के साथ मठ/पीठ ऐसे केंद्र बने जहाँ अध्ययन, साधना, और शास्त्रीय परंपरा को संरक्षित किया गया।
  • इन पीठों के प्रमुख आचार्य “शंकराचार्य” कहलाने लगे।

“पीठ” या “मठ” क्या होता है? क्या यह मंदिर जैसा होता है?

मठ (या पीठ/पीठम) केवल मंदिर नहीं होता। यह संन्यासी परंपरा का संस्थान (monastic institution) होता है, जहाँ परंपरागत रूप से ये कार्य होते हैं:

  • धर्म और वेदांत का शिक्षण/प्रवचन
  • वेद, उपनिषद, गीता, ब्रह्मसूत्र, शास्त्रों का अध्ययन
  • पूजा-परंपरा और विधियाँ
  • पांडुलिपियों/ग्रंथों का संरक्षण
  • संन्यासियों/शिष्यों का प्रशिक्षण
  • सामाजिक-धार्मिक मार्गदर्शन और सार्वजनिक धर्मकार्य

यानी, मठ/पीठ को आप अध्ययन + साधना + परंपरा-रक्षा का केंद्र मान सकते हैं।

भारत में कितने शंकराचार्य होते हैं?

यह सबसे बड़ा “कॉमन मैन” सवाल है—और इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप “शंकराचार्य” से क्या मतलब ले रहे हैं।

सबसे सामान्य और प्रचलित उत्तर: चार शंकराचार्य (चार आम्नाय पीठ)

परंपरागत रूप से, भारत में चार प्रमुख “आम्नाय पीठ” (North, South, East, West) का उल्लेख किया जाता है। आम बोलचाल में यही “चार शंकराचार्य” माने जाते हैं:

  • श्रृंगेरी (कर्नाटक) – दक्षिण
  • पुरी (ओडिशा) – पूर्व
  • द्वारका (गुजरात) – पश्चिम
  • ज्योतिर्मठ/जोशीमठ (उत्तराखंड) – उत्तर

इन चारों को कई जगह “चतुराम्नाय पीठ” (चार पीठ) के रूप में भी बताया जाता है।

इन पीठों के वर्तमान शंकराचार्य कौन हैं? (जनवरी 2026 के अनुसार)

शंकराचार्य पद पर समय के साथ उत्तराधिकार (succession) होता रहता है, इसलिए इसे तारीख-आधारित (time-stamped) जानकारी की तरह देखें।

  • श्रृंगेरी शारदा पीठ (दक्षिण): जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामीजी (Sri Bharati Tirtha Mahaswamiji) — वर्तमान जगद्गुरु। इसी परंपरा में उत्तराधिकारी/जूनियर पोंटिफ के रूप में जगद्गुरु श्री विदुषेखर भारती महास्वामीजी (Sri Vidhushekhara Bharati Mahaswamiji) का भी उल्लेख मिलता है।
  • गोवर्धन मठ, पुरी (पूर्व): जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती (Swami Sri Nischalananda Saraswati)।
  • द्वारका शारदा पीठ (पश्चिम): जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती (Swami Sri Sadananda Saraswati)।
  • ज्योतिर्मठ/जोशीमठ (उत्तर): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Swami Avimukteshwaranand Saraswati) का नाम व्यापक रूप से शंकराचार्य के रूप में सूचीबद्ध किया जाता है; ध्यान रहे कि अलग-अलग समय में इस पीठ को लेकर सार्वजनिक/कानूनी विवाद भी चर्चा में रहे हैं, इसलिए सबसे ताज़ा स्थिति के लिए पीठ के आधिकारिक संचार से सत्यापन करना बेहतर रहता है।
  • कांची कामकोटि पीठ (कांचीपुरम): नीचे बताए गए “कांची” वाले संदर्भ में, कांची परंपरा को मानने वालों के अनुसार वर्तमान पोंटिफ श्री शंकर विजयेंद्र सरस्वती स्वामिगल (Sri Shankara Vijayendra Saraswati Swamigal) हैं।

एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त बात: कांची कामकोटि पीठ (“पांचवाँ” दावा)

कई भक्त और परंपरा-पालक कांची कामकोटि पीठ (कांचीपुरम, तमिलनाडु) को भी एक प्रमुख शंकराचार्य पीठ के रूप में मानते हैं और वहाँ की परंपरा यह भी कहती है कि यह पीठ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित है। लेकिन इस दावे को लेकर अकादमिक/ऐतिहासिक स्तर पर विवाद और अन्य परंपराओं में असहमति भी मिलती है।

इसलिए एक संतुलित, सटीक तरीका यह है:

  • सबसे प्रचलित रूप से: 4 शंकराचार्य पीठ (चतुराम्नाय)।
  • इसके अलावा: कांची को उसके अनुयायी शंकराचार्य पीठ मानते हैं, लेकिन “आदि शंकर द्वारा स्थापना” वाली ऐतिहासिकता पर बहस/विवाद मौजूद है।

चार मुख्य शंकराचार्य पीठ कौन-कौन से हैं और इन्हें महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

लोग अक्सर पूछते हैं—“चार ही क्यों? इन चारों का खास क्या है?” परंपरा में एक सामान्य व्याख्या यह भी मिलती है कि हर पीठ किसी क्षेत्र में धर्म/वेदांत परंपरा को संरक्षित रखने और शास्त्रीय अध्ययन को आगे बढ़ाने का केंद्र रहा।

यहाँ एक सरल परिचय:

1 श्रृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक) – दक्षिण पीठ

श्रृंगेरी दक्षिण भारत के सबसे प्रसिद्ध अद्वैत वेदांत केंद्रों में गिना जाता है, जहाँ शास्त्र-अध्ययन, अनुशासन और परंपरा की निरंतरता का विशेष महत्व बताया जाता है।

वर्तमान शंकराचार्य (जनवरी 2026): जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामीजी; और परंपरा में जगद्गुरु श्री विदुषेखर भारती महास्वामीजी का भी उल्लेख उत्तराधिकारी/जूनियर पोंटिफ के रूप में मिलता है।

2 गोवर्धन मठ/गोवर्धन पीठ (पुरी, ओडिशा) – पूर्व पीठ

पुरी का गोवर्धन मठ अद्वैत वेदांत की परंपरा और जगन्नाथ पुरी के धार्मिक वातावरण के साथ जुड़ा हुआ माना जाता है।

वर्तमान शंकराचार्य (जनवरी 2026): जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती

3 द्वारका शारदा पीठ (गुजरात) – पश्चिम पीठ

द्वारका को चार प्रमुख पीठों में शामिल किया जाता है और इसे पश्चिम भारत में परंपरा-रक्षा व वेदांत शिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

वर्तमान शंकराचार्य (जनवरी 2026): जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानंद सरस्वती

4 ज्योतिर्मठ/जोशीमठ (उत्तराखंड) – उत्तर पीठ

ज्योतिर्मठ हिमालयी क्षेत्र में स्थित उत्तर पीठ के रूप में जाना जाता है, जहाँ तप, वैराग्य और वेदांत अध्ययन की परंपरा का उल्लेख मिलता है।

वर्तमान शंकराचार्य (जनवरी 2026): स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (ध्यान रहे: अलग-अलग समय में इस पीठ के नेतृत्व को लेकर विवाद भी चर्चा में रहे हैं, इसलिए सबसे ताज़ा स्थिति के लिए आधिकारिक स्रोत देखना बेहतर है)।

“यह पद कौन ग्रहण कर सकता है?” क्या कोई भी शंकराचार्य बन सकता है?

यहाँ सबसे बड़ी गलतफहमी होती है।

शंकराचार्य ऐसा पद नहीं है जिसके लिए आप आवेदन (apply) करें। यह एक संन्यासी पीठ है, और इसे सामान्यतः वही व्यक्ति धारण करता है जो लंबे समय से संन्यास परंपरा में प्रशिक्षित, अनुशासित और शास्त्र-ज्ञान में प्रवीण हो।

आसान शब्दों में, शंकराचार्य आमतौर पर:

  • संन्यासी (सन्न्यासी/मुनि) होते हैं, गृहस्थ नहीं
  • वर्षों तक वेद, वेदांत, शास्त्र का अध्ययन करते हैं
  • उनके जीवन में अनुशासन, चरित्र, वैराग्य, अध्यात्म-परिपक्वता दिखती है
  • वे उसी मठ/परंपरा के संन्यासी-क्रम/गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़े होते हैं

तो सामान्यतः कौन “पात्र नहीं” माना जाता?

  • जो इसे प्रसिद्धि, राजनीति या “स्टेटस” के लिए चाहता हो
  • जो संन्यास-जीवन और शास्त्रीय अध्ययन के बिना केवल नाम/पद चाहता हो
  • जो उस संस्थान की अनुशासित परंपरा से बाहर हो

निष्कर्ष (साधारण भाषा में): आम व्यक्ति के लिए सही सवाल यह नहीं कि “मैं शंकराचार्य कैसे बनूँ?” बल्कि यह है कि “मैं शंकराचार्य परंपरा की शिक्षाओं से क्या सीख सकता/सकती हूँ?”

शंकराचार्य का चयन कैसे होता है?

आम सवाल: “क्या चुनाव होता है? क्या यह वंशानुगत (hereditary) होता है?”—सामान्यतः, यह वंशानुगत नहीं और सार्वजनिक चुनाव जैसा भी नहीं होता।

बहुत सी परंपराओं में:

  • मठ अपने भीतर एक योग्य शिष्य/वरिष्ठ संन्यासी को चिन्हित करता है
  • वर्षों तक उन्हें जिम्मेदारियाँ सौंपी जाती हैं
  • फिर परंपरागत प्रक्रिया के अनुसार उत्तराधिकार तय होता है

क्योंकि हर पीठ/मठ की आंतरिक परंपराएँ कुछ अलग हो सकती हैं, और कुछ स्थानों पर समय-समय पर विवाद भी हुए हैं—इसलिए “एक ही नियम” सब जगह लागू है, ऐसा मानना सही नहीं।

शंकराचार्य वास्तविक जीवन में क्या करते हैं?

कई लोगों को लगता है कि शंकराचार्य केवल पूजा या अनुष्ठान तक सीमित होते हैं, लेकिन उनकी भूमिका अक्सर इससे कहीं व्यापक होती है:

1) धर्म और वेदांत का संरक्षण व शिक्षण

प्रवचन, शास्त्र-शिक्षा, साधकों को मार्गदर्शन और परंपरा की शुद्धता बनाए रखना।

2) संन्यासियों का मार्गदर्शन और मठ-संस्था का संचालन

मठ एक व्यक्ति नहीं—एक जीवंत संस्था होती है, जिसमें शिष्य, संन्यासी, अध्ययन-परंपरा, और कई प्रकार की जिम्मेदारियाँ होती हैं।

3) समाज को धार्मिक/नैतिक मार्गदर्शन

समाज में जब धर्म, आचार, पर्व-परंपरा या नैतिकता को लेकर भ्रम बढ़ता है, तो शंकराचार्य जैसे आचार्य लोगों के प्रश्नों का उत्तर देते हैं और मार्गदर्शन करते हैं।

4) ग्रंथ/पांडुलिपि/परंपरा की निरंतरता

कई मठों का एक बड़ा योगदान यह भी रहा है कि उन्होंने शास्त्रीय ज्ञान, पांडुलिपियाँ, और परंपरागत अध्ययन-प्रणाली को संरक्षित रखा।

क्या शंकराचार्य सभी हिंदू गुरुओं से “ऊपर” होते हैं?

सम्मान के साथ समझने योग्य बात यह है:

  • शंकराचार्य एक विशिष्ट परंपरा (अद्वैत वेदांत) के भीतर एक विशिष्ट उपाधि है।
  • हिंदू परंपरा में कई धाराएँ हैं—वैष्णव, शैव, शाक्त, स्मार्त, और अनेक संप्रदाय—जिनके अपने-अपने आचार्य/गुरु होते हैं।

इसलिए शंकराचार्य अत्यंत सम्माननीय होते हैं, लेकिन हिंदू धर्म को एक “एकल पदानुक्रम” (single hierarchy) में बांधकर देखना सही नहीं।

क्या शंकराचार्य कोई सरकारी पद है? क्या उन्हें वेतन या आधिकारिक शक्ति मिलती है?

नहीं। शंकराचार्य सरकारी पद नहीं हैं।

हाँ, उन्हें कई बार राज्य/समाज के बड़े आयोजनों में आमंत्रित किया जाता है, मीडिया में उनके विचार दिखते हैं, और कुछ विषयों पर उनका प्रभाव रहता है—पर उनकी मुख्य “अथॉरिटी” आध्यात्मिक और संस्थागत होती है, किसी सरकारी प्रशासनिक शक्ति जैसी नहीं।

क्या सामान्य लोग शंकराचार्य से मिल सकते हैं? सही तरीका क्या है?

हाँ, लोग अक्सर:

  • दर्शन/आशीर्वाद
  • व्यक्तिगत मार्गदर्शन
  • धर्म-परंपरा से जुड़े प्रश्नों के उत्तर
  • जीवन की कठिन परिस्थितियों में सलाह

के लिए शंकराचार्य/मठ से संपर्क करते हैं। आम तौर पर बेहतर यही होता है कि:

  • मठ की आधिकारिक व्यवस्था/नियमों का पालन करें
  • विनम्र, संक्षिप्त और सच्चे भाव से बात करें
  • इसे “सेलिब्रिटी मीट” की तरह नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मुलाकात की तरह देखें

अंग्रेजी में पढ़ें : Who are Shankaracharyas? : Meaning, Role, Eligibility, and How Many Shankaracharyas Exist in India

Leave a Reply

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *