भारतवर्ष की पुण्यभूमि पर कई ऐसे दिव्य और अद्भुत चरित्र जन्मे हैं जिनकी गाथाएं युगों-युगों तक श्रद्धा और भक्ति का केंद्र बनी रहती हैं। इन्हीं में से एक हैं खाटू श्याम जी, जिन्हें भक्तजन ‘हारे के सहारे’ के नाम से पूजते हैं। राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में स्थित खाटू श्याम जी का मंदिर आज भी आस्था का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है, जहाँ देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन और सेवा के लिए आते हैं। परंतु क्या आप जानते हैं कि खाटू श्याम जी का वास्तविक नाम ‘बर्बरीक’ था और वे महाभारत के महान योद्धा घटोत्कच के पुत्र थे? आइए, इस लेख में विस्तार से जानते हैं कि खाटू श्याम कौन हैं और बर्बरीक से उनका नाम खाटू श्याम कैसे पड़ा।

बर्बरीक: घटोत्कच का वीर पुत्र

Barbarika ghatotkach ka veer putra : महाभारत के वीर योद्धा घटोत्कच, जो राक्षसी शक्ति और मायावी युद्धकला में निपुण थे, उनके पुत्र थे बर्बरीक। माता मोरवी (अहिलावती) और पिता घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक बचपन से ही अद्भुत शक्तियों से सम्पन्न थे। लोक मान्यताओं के अनुसार उन्हें भगवान शिव से तीन अमोघ बाणों का वरदान प्राप्त था, जिन्हें ‘तीन बाण’ कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि उन्होंने देवी सिद्धंबिका की तपस्या कर उनसे भी दिव्य शक्तियाँ प्राप्त कीं। तीनों बाणों की मान्यता के अनुसार — पहला बाण शत्रु को चिन्हित करता, दूसरा उनका संहार करता, और तीसरा सभी बाणों को वापस बुला लेता था।

कुछ कथाओं में उल्लेख आता है कि बर्बरीक ने स्वयं यह स्वीकार किया था कि तीसरा बाण सबसे विनाशकारी है और वे इसका उपयोग तभी करेंगे जब अत्यंत आवश्यक हो।

एक अन्य जनश्रुति के अनुसार, बर्बरीक को यह भी वरदान प्राप्त था कि उन्हें केवल तभी मारा जा सकता है जब वे निहत्थे और अचेत अवस्था में हों। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने उनसे शीश दान माँगा।

महाभारत में भाग लेने की इच्छा

Mahabharat me bhaag lene ki echha : बर्बरीक में धर्म और न्याय के लिए लड़ने की तीव्र भावना थी। उन्होंने शिव और देवी सिद्धंबिका को यह वचन दिया था कि वे सदैव उस पक्ष से युद्ध करेंगे जो युद्ध में कमजोर या हार के कगार पर होगा। जब कुरुक्षेत्र का युद्ध प्रारंभ होने वाला था, तब वे युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान कर गए। कई लोक कथाओं में उल्लेख आता है कि उन्होंने यह भी कहा कि वे युद्ध में भाग नहीं लेंगे लेकिन युद्ध को बाहर से देखना चाहते हैं। वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ युद्ध स्थल के पास पहुँचे।

श्रीकृष्ण से बर्बरीक का मिलन

Shri krishna se Barbarika ka milan : लोक कथाओं के अनुसार जब श्रीकृष्ण को ज्ञात हुआ कि कोई अत्यंत बलशाली योद्धा युद्ध भूमि की ओर बढ़ रहा है, तो वे बर्बरीक से मिलने गए। कुछ कथाओं में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ने कोई वेश धारण नहीं किया था, जबकि अन्य कहानियों में उल्लेख है कि उन्होंने ब्राह्मण का वेश लिया था। उन्होंने बर्बरीक से उनके युद्ध कौशल और पक्ष चयन के बारे में पूछा। बर्बरीक ने स्पष्ट किया कि वे सदैव उस पक्ष का साथ देंगे जो कमजोर होगा।

श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की शक्ति और उसके प्रभाव को समझते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि यदि वे युद्ध में शामिल होते हैं तो युद्ध का संतुलन बार-बार बदलता रहेगा, और इससे युद्ध का उद्देश्य विफल हो जाएगा।

श्रीकृष्ण द्वारा बर्बरीक से शीश का दान माँगना

Shri krishna dwara Barbarika se sheesh ka daan mangna : इस स्थिति में धर्म की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से शीश (सिर) दान माँगा। लोककथाओं में यह वर्णन है कि बर्बरीक ने श्रीकृष्ण के इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकार किया और बिना किसी संकोच के अपना शीश अर्पित कर दिया। इस त्याग से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में तुम ‘श्याम’ नाम से पूजे जाओगे और तुम्हारे नाम का स्मरण करने से लोगों के कष्ट दूर होंगे।

कुछ धार्मिक धारावाहिकों में यह भी दर्शाया गया है कि बर्बरीक अंत में पुनः जीवित हो जाते हैं, जो उनके दिव्य स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

खाटू श्याम नाम कैसे पड़ा?

Khatu Shyam naam kaise pada : बर्बरीक का शीश काटे जाने के बाद, उनकी माँ मोरवी ने प्रार्थना की कि उनका सिर किसी पवित्र स्थान पर रखा जाए और वह वहां से युद्ध का सम्पूर्ण दृश्य देख सके। लोक विश्वास है कि श्रीकृष्ण ने उनके शीश को खाटू नगरी (वर्तमान में राजस्थान के सीकर जिले में स्थित) में स्थापित करने का आदेश दिया। वर्षों बाद एक किसान को उस स्थान पर खुदाई करते समय शीश प्राप्त हुआ। तत्पश्चात वहां भव्य मंदिर की स्थापना हुई। श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए वरदान के अनुसार बर्बरीक को ‘श्याम’ नाम मिला और जिस स्थान पर उनका शीश स्थापित हुआ, वही जगह ‘खाटू श्याम’ के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

हारे के सहारे क्यों कहलाते हैं?

Haare ke sahare kyo kahalate hai ? : खाटू श्याम जी को ‘हारे के सहारे’ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने सदैव पराजित, दुखी और निराश जनों की सहायता की है। उनका मूल सिद्धांत ही यह था कि वे हमेशा हारने वाले के पक्ष में खड़े होंगे। आज भी उनके भक्त मानते हैं कि जब जीवन में हर ओर से हार का सामना होता है, तब खाटू श्याम जी ही अंतिम आश्रय बनते हैं। वे न केवल भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं, बल्कि उन्हें आत्मबल और आशा भी प्रदान करते हैं।

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