भानु सप्तमी 2026 : महत्व, सूर्य पूजा विधि, व्रत नियम, कथा और लाभ

भानु सप्तमी एक ऐसा पावन व्रत-उपवास है जिसके बारे में बहुत-से लोग तभी सुनते हैं जब पंचांग में इसका नाम दिखता है। तब मन में स्वाभाविक प्रश्न आता है—“भानु सप्तमी क्या होती है? इसे क्यों मनाते हैं? और इस दिन क्या करना चाहिए?” यदि आपने पहले कभी भानु सप्तमी का व्रत नहीं रखा, तो भी चिंता की बात नहीं है। इस लेख का उद्देश्य बिल्कुल आसान भाषा में, पूरी जानकारी के साथ, भानु सप्तमी का महत्व, पूजा-विधि, व्रत नियम, कथा और इससे जुड़ी सामान्य शंकाओं के उत्तर देना है।

हिंदू परंपरा में सूर्यदेव केवल प्रकाश और ऊष्मा के स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे ‘प्राण-शक्ति’ के प्रतीक माने गए हैं। अनुशासन, आत्मविश्वास, तेज, सत्य, स्वास्थ्य और जीवन-ऊर्जा—इन सबका संबंध सूर्य उपासना से जोड़ा जाता है। इसलिए जब सप्तमी तिथि और रविवार का संयोग बनता है, तो यह दिन विशेष रूप से सूर्य आराधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।

भानु सप्तमी क्या है?

बहुत-से लोगों के मन में यह सवाल आता है—“bhanu saptami kise samarpit hai”? यह व्रत सूर्यदेव को समर्पित माना जाता है।

‘भानु’ सूर्य का एक प्रसिद्ध नाम है और ‘सप्तमी’ चंद्र मास की सातवीं तिथि को कहा जाता है। जब सप्तमी तिथि रविवार (रविवार/आदित्यवार) के दिन आती है, तो उसे भानु सप्तमी कहा जाता है। सरल शब्दों में, यह “सूर्य से जुड़ी सप्तमी” है, जिसमें सूर्यदेव की आराधना को विशेष फलदायी माना जाता है।

भानु सप्तमी 2026 कब है?

साल 2026 में भानु सप्तमी 8 फरवरी 2026 (रविवार) को है। इस दिन सूर्यदेव को अर्घ्य, मंत्र-जप, दान और सात्त्विक नियमों के साथ व्रत रखा जाता है।

8 फरवरी 2026 को कौन-सी तिथि है?

8 फरवरी 2026 को पंचांग अनुसार कृष्ण पक्ष सप्तमी का संयोग बन रहा है। (तिथि-समय शहर के अनुसार थोड़ा बदल सकता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग भी अवश्य देखें।)

भानु सप्तमी क्यों शुभ मानी जाती है?

सूर्यदेव को जीवन में ‘ऊर्जा’ और ‘तेज’ का आधार माना गया है। रोज़ सुबह सूर्य की पहली किरणों के साथ दिन की शुरुआत करने से मन में सकारात्मकता आती है, शरीर में सक्रियता बढ़ती है और दिनचर्या में अनुशासन बनता है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी सूर्य ‘आत्मबल’ और ‘स्वाभिमान’ के प्रतीक हैं।

भानु सप्तमी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इस दिन रविवार का प्रभाव जुड़ जाता है। बहुत-से श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस संयोग में की गई सूर्य आराधना—विशेषकर सूर्य अर्घ्य, सूर्य मंत्र-जप और दान—स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा और जीवन में स्थिरता के लिए सहायक होती है।

क्या भानु सप्तमी और रथ सप्तमी एक ही है?

यह भ्रम अक्सर होता है। रथ सप्तमी एक प्रसिद्ध पर्व है जो आमतौर पर माघ शुक्ल सप्तमी को मनाया जाता है और कई क्षेत्रों में इसे सूर्यदेव के रथ-प्रसंग से जोड़कर बड़े उत्सव रूप में मनाया जाता है।

भानु सप्तमी किसी एक निश्चित तिथि का नाम नहीं है, बल्कि यह “सप्तमी + रविवार” के संयोग से बनती है। इसलिए दोनों में सूर्य उपासना समान जरूर है, लेकिन दोनों एक ही पर्व नहीं हैं।


भानु सप्तमी व्रत कौन रख सकता है?

भानु सप्तमी का व्रत कोई भी रख सकता है। विशेष रूप से वे लोग इस व्रत की ओर आकर्षित होते हैं जो:

स्वास्थ्य, ऊर्जा और रोग-प्रतिरोधक क्षमता में सुधार चाहते हैं। जीवन में अनुशासन और नियमितता बढ़ाना चाहते हैं। पढ़ाई या करियर में फोकस और आत्मविश्वास बढ़ाना चाहते हैं। सम्मान, प्रतिष्ठा और नेतृत्व से जुड़े क्षेत्रों में स्थिरता चाहते हैं।

परंपरा में महिलाएं भी यह व्रत परिवार की मंगल कामना, सुख-शांति और समृद्धि के लिए रखती हैं।

भानु सप्तमी के दिन क्या करते हैं?

भानु सप्तमी का केंद्र एक ही है—सूर्यदेव को श्रद्धा से अर्घ्य देना और सात्त्विक नियमों का पालन करना।

मुख्य नियम: सूर्योदय के समय सूर्य अर्घ्य

इस दिन सूर्योदय के समय सूर्यदेव को जल अर्पित करना सबसे प्रमुख कर्म माना जाता है। सामान्यतः तांबे के लोटे में साफ जल लेकर, उसमें कुमकुम और लाल फूल (यदि उपलब्ध हो) डालकर अर्घ्य दिया जाता है।

यदि आपके पास आंगन/छत/बालकनी है तो वहीं से सूर्योदय का दर्शन करके अर्घ्य दें। यदि यह संभव न हो, तो जहां से सूर्य का प्रकाश दिखे वहां श्रद्धा से अर्घ्य दें। इस कर्म में दिखावा नहीं, भाव और नियमितता सबसे महत्वपूर्ण है।

भानु सप्तमी की पूजा विधि (आसान और शुरुआत करने वालों के लिए)

सुबह जल्दी उठें और संभव हो तो सूर्योदय से पहले स्नान कर लें। स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर/पूजा स्थान को साफ रखें। अब तांबे के पात्र में शुद्ध जल भरें। इसमें थोड़ा-सा कुमकुम मिलाएं और एक लाल फूल रखें।

अब सूर्य की ओर मुख करके शांत मन से खड़े हों। जल को धीरे-धीरे अर्पित करें और मन ही मन सूर्यदेव से स्वास्थ्य, तेज, आत्मबल और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।

अर्घ्य के बाद कुछ समय मंत्र-जप करें। यदि आपको आदित्य हृदय स्तोत्र आता है तो उसका पाठ कर सकते हैं। नहीं आता, तो भी कोई बाधा नहीं—सूर्यदेव का नाम श्रद्धा से लेना ही पर्याप्त माना जाता है।

इसके बाद घर में दीपक जलाएं, फल/मिश्री/गुड़ जैसे सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें और कुछ क्षण मौन रहकर कृतज्ञता का भाव रखें।

भानु सप्तमी पर कौन-सा मंत्र जपें?

भानु सप्तमी पर एक सरल और लोकप्रिय मंत्र है:

“ॐ सूर्याय नमः”

आप इसे 11, 21 या 108 बार जप सकते हैं। कई लोग गायत्री मंत्र या सूर्य स्तोत्रों का पाठ भी करते हैं। मंत्र-जप का उद्देश्य संख्या नहीं, एकाग्रता और श्रद्धा है।

भानु सप्तमी व्रत के नियम: उपवास कैसे रखें?

व्रत-नियम परिवार की परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकते हैं। सामान्यतः लोग इस दिन:

पूरा दिन उपवास रखकर शाम को या पूजा के बाद भोजन करते हैं। फलाहार (फल, दूध, व्रत के अनुकूल सात्त्विक आहार) करते हैं। ‘एकभुक्त’ (दिन में एक बार सात्त्विक भोजन) करते हैं।

ध्यान रहे—यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो बहुत कठोर उपवास न करें। व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रिय-निग्रह, अनुशासन और पवित्रता बढ़ाना है।

भानु सप्तमी व्रत कथा (संक्षेप में)

भानु सप्तमी से जुड़ी व्रत कथाओं का मूल संदेश यही होता है कि सच्ची श्रद्धा और नियमपूर्वक साधना जीवन को बदल सकती है। परंपरा में एक कथा में ‘इंदुमती’ का प्रसंग मिलता है, जो जीवन में कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग पूछती हैं। ऋषि वशिष्ठ उन्हें सूर्य उपासना से जुड़ी सप्तमी व्रत-परंपरा का महत्व समझाते हैं और बताते हैं कि नियमित पूजा, संयम और दान के साथ किया गया भानु सप्तमी व्रत व्यक्ति के जीवन में तेज, शांति और स्थिरता ला सकता है।

कथा का सार यही है कि जब साधना में ईमानदारी और जीवन में शुद्ध आचरण जुड़ जाता है, तो कठिन परिस्थितियों में भी आशा का द्वार खुलने लगता है।

भानु सप्तमी पर क्या दान करें?

दान को इस दिन विशेष महत्व दिया जाता है। लोग अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों को:

अनाज, गुड़, वस्त्र, फल, या दैनिक उपयोग की वस्तुएं दान करते हैं। किसी भूखे को भोजन कराना या किसी की मदद करना भी बहुत बड़ा दान माना जाता है।

दान का भाव यह होना चाहिए कि आपकी वजह से किसी को राहत मिले। भानु सप्तमी का “सूर्य-तत्व” हमें यही सिखाता है—दूसरों के जीवन में भी प्रकाश बनें।

भानु सप्तमी पर लोग कौन-सी गलतियाँ करते हैं?

कुछ लोग इसे केवल एक औपचारिक रस्म की तरह कर लेते हैं। जबकि पूजा का वास्तविक फल तब मिलता है जब मन, वाणी और कर्म में भी सात्त्विकता हो।

दूसरी गलती यह है कि लोग अपने शहर का पंचांग देखे बिना समय तय कर लेते हैं। तिथि-समय स्थान के अनुसार बदलता है, इसलिए यदि आप समय का विशेष ध्यान रखते हैं, तो अपने शहर के पंचांग के अनुसार करें।

एक और आम गलती यह है कि बहुत कठोर उपवास रखकर चिड़चिड़ापन आ जाता है। यदि व्रत के कारण स्वभाव बिगड़ रहा हो, तो व्रत का उद्देश्य पूरा नहीं होता। हमेशा संतुलित और स्वास्थ्य-सुरक्षित तरीका अपनाएं।

भानु सप्तमी से जुड़े मिथक और वास्तविकता

मिथक: यह व्रत केवल उन्हीं के लिए है जिनकी कुंडली में सूर्य कमजोर है।

वास्तविकता: सूर्य उपासना एक सार्वभौमिक साधना है—स्वास्थ्य, अनुशासन, कृतज्ञता और आत्मबल के लिए कोई भी कर सकता है।

मिथक: पूरा कठोर व्रत न हो तो व्रत का फल नहीं मिलता।

वास्तविकता: भक्ति का माप कठिनाई नहीं है। श्रद्धा से सूर्य अर्घ्य, संयमित दिनचर्या और थोड़ा-सा दान भी भानु सप्तमी की भावना को पूरा करता है।

भानु सप्तमी 8 फरवरी 2026 (रविवार) को पड़ रही है और यह सूर्य उपासना के लिए अत्यंत शुभ अवसर माना जाता है। इस दिन सूर्योदय के समय तांबे के पात्र से सूर्यदेव को अर्घ्य देना, “ॐ सूर्याय नमः” का जप करना, सात्त्विक नियमों का पालन करना और सामर्थ्य अनुसार दान करना—ये सभी सरल उपाय भानु सप्तमी को सार्थक बनाते हैं।

इस व्रत का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन में प्रकाश, ऊर्जा और अनुशासन बनाए रखें—और अपने भीतर के ‘सूर्य’ को जागृत करें।

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